नई दिल्ली: हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल जब भी क़ायम होते हुए देखने को मिलती है तो गर्व तो महसूस होना ही चाहिए.भारत हो या पाकिस्तान,हिन्दू मुस्लिम हो या सिख ईसाई,दोनों ही देशों में आज भी ऐसे लोग मौजूद है जो आपसी सौहार्द को बनाए रखने की हर कोशिशों को पूरा कर मिसाल पेश करते है, इस बात की एक मिसाल पाकिस्तान के हिंदू मंदिरों में मुहर्रम के मौके पर देखने के लिए मिली है,जहां मंदिरों के प्रांगण में ताजिया तैयार किए जा रहे हैं. ये ताजिया मोहर्रम के नौवें और 10वें दिन निकाले जाने वाले आशूरा के जुलूस का अहम हिस्सा माने जाते है, जिनकी अब दुनिया भर में तारीफ़े हो रही है।

ऐसी ही कुछ मिसाल केरल में आई बाढ़ से हताहत हुए लोगों ने पेश की थी, कही हिन्दुओ ने मस्जिद को अपनी शरणार्थियों का कैम्प बनाया तो कही मदरसे को अपना कैम्प बनाया,तो कही हिन्दुओ ने मुस्लिमो के ठहरने का इन्तेज़ामात मंदिरों में किया तो कही गुरद्वारे में मुस्लिमो ने नमाज़े अदा की।
मोहर्रम के माह में ईमाम हुसैन और उनके साथियों की कर्बला के मैदान में हुई शहादत को दिल से याद किया जाता है व हुसैन के किस्से सुनकर लड़ने की ताक़त मिलती है. पुराने कराची शहर इलाके में कम से कम दो प्राचीन हिंदू मंदिरों में हिंदू समुदाय पूरे जोश एवं उत्साह से ताजिया बनाता है. ये ताजिया पैगंबर मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन और हजरत इमाम हसन के मकबरों का प्रतिरूप होते हैं और आशूरा के जुलूस का अभिन्न हिस्सा होते हैं.
कराची के हिंदू बहुल नारायणपुरा इलाके के एक हिंदू राजेश ने कहा, “हम पिछली तीन पीढ़ियों से ये ताजिया बना रहे हैं और इस पर हम गर्व महसूस करते हैं.” अकबर रोड पर कुछ मील दूरी पर बने 100 साल पुराने मरीमाता मंदिर के प्रांगण में हिंदू समुदाय ने एक शानदार ताजिया बनाने के लिए दिन-रात काम किया.













