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Home विदेश

भारत को अफगानिस्तान मे फंसाने की अमेरिकी-इज़राईली साज़िश

Agha Khursheed Khan by Agha Khursheed Khan
फ़रवरी 23, 2020
in विदेश
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अफगानिस्तान

अफगानिस्तान

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लगभग 19 वर्षो मे 2200 बिलियन डॉलर को गंवाने के बाद अमेरिका को समझ मे आया, कि अफग़ानिस्तान मे अपनी सेनाओ को रखना बहुत बड़ा मूर्खतापूर्ण और घाटे का सौदा होगा। अफगानिस्तान को दुनिया से नक्शे से मिटा देने की अमेरिकी राष्ट्रपति की धमकियो के बावजूद भी तालिबान ने 28 जनवरी 2020 को ग़ज़नी प्रांत मे अमेरिका के उस हवाई जहाज (E-11A) को मार गिराया, जिसमे माइकल एंड्रिया (Michael D’Andrea) जैसे सी०आई०ए० (CIA) के वरिष्ठ अधिकारी के बैठे होने का शक है।

 

 

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फिर चंद दिनो बाद दक्षिण अफगानिस्तान के ख़ोस्त प्रांत से अमेरिका को अपमानित करने वाला समाचार आया,जब ठेकेदार की आड़ मे काम करने वाली “ब्लैक-वाटर” (Black Water) जैसी अमेरिका की एक दूसरी निजी सुरक्षा संस्था “इंटरनेशनल लॉजिस्टिकल सपोर्ट” (International Logistical Support) के प्रबंध संचालक “मार्क आर० फरेरिक्स” (Mark R. Frerichs) को तालिबान ने अपहृत कर लिया।

लगभग पिछले डेढ़ वर्ष से अमेरिकी दूत ज़ल्म-ए-खलीलज़ाद (Zalmay Khalilzad) के माध्यम से तालिबान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता चल रही थी, तालिबान टीम का नेतृत्व मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर (Mullah Abdul Ghani Baradar) और शेर मोहम्मद अब्बास स्तानकज़ई (Sher Mohammed Abas Stanekzai) कर रहे थे।

अंतिम समझौते से पहले अमेरिका को तालिबान का नाम आतं!कवादियो की सूची से बाहर करना होगा, इसलिये तालिबान की छवि निर्माण (Image Building) करते हुये अमेरिका के मशहूर अखबार “न्यूयॉर्क टाइम्स” ने एक करोड़ अमेरिकी डॉलर के इनामी आतं!कवादी “सिराजुद्दीन हक्कानी” का लेख छाप कर अमेरिकी जनता के सामने तालिबान का भावुक पक्ष रखा।

29 फरवरी 2020 को अमेरिका और तालिबान के बीच मे समझौता होने की संभावना है, जिसके अनुसार 5000 तालिबान कैदियो को रिहा करना पड़ेगा, उसके बदले मे तालिबान 1000 अफगान सैनिको और विदेशियो को आजाद करेगे।

ये भी पढ़ें: राजस्थान: दलित की पि!टाई की और नाज़ुक अंगो पर पेट्रोल डाला

अमेरिका ने बहुत चालाकी से शांतिवार्ता और अफगानिस्तान से अपनी फौजे वापस बुलाने के लिये तालिबान के सामने सात दिन के युद्धविराम की शर्त रक्खी, ताकि इस दौरान भारत को अफगानिस्तान मे भारतीय सेना भेजने के लिये मनाया जा सके।

अमेरिका का दूसरा लक्ष्य अफगानिस्तान मे नस्लीय टकराव (Ethnic Clashes) को बढ़ाना था, जिसमे तुरंत सफलता मिली और ताजिक नेता अब्दुल्लाह-अब्दुल्लाह ने ग़नी सरकार पर चुनाव मे धांधली का आरोप लगाते हुये अपना समर्थन वापस ले लिया, फिर उज़्बेक नेता रशीद दोस्तम ने भी अपनी आस्तीने चढ़ाना शुरु कर दी।

अफगानिस्तान की आबादी मे पख्तून (पठान) लगभग 38% से 40%, ताजिक 25% से 27%, उज़्बेक 8% से 9%, हज़ारा 9% से 10% और बाकी दूसरे नस्ल (Race) के लोग है, इनमे लगभग 88% से 90% सुन्नी, 9% से 10% शिया और बाकी दूसरे पंथ (Sects) के लोग है।

अमेरिका अपनी सेना की सुरक्षित वापसी तो चाहता है, लेकिन वह यह भी जानता है, कि उसके हटते ही ग़नी सरकार गिर जायेगी और अधिकांश अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा हो जायेगा, इसलिए अमेरिका अपने हितो की सुरक्षा के लिए वहां पर शिया-सुन्नी, पख्तून-ताजिक, हज़ारा-उज़्बेक के बीच मे झगड़ा बढ़ाना चाहता है, इसके अतिरिक्त अमेरिका अपनी ब्लैक वाटर जैसी निजी सेना, दाईश (ISIL) जैसा खूंखार वहाबी आतंकवादी संगठन और ड्रग माफिया की भी उपस्थिति अफगानिस्तान मे चाहता है।

ईरान के साथ लगातार बढ़ते तनाव ने अमरीका के लिये एक नई समस्या पैदा कर दी है, जिसके कारण उसे अफगानिस्तान मे कठपुतली सरकार चाहिए और वह तालिबान के ऊपर भरोसा नही कर सकता है, क्योकि वह पाकिस्तान के पिट्ठू है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप चाहते है, कि भारत बिना शर्त अफगानिस्तान मे अपनी सेना भेज दे, जबकि मोदी सरकार कश्मीर मुद्दे, भारत-पाक युद्ध और संयुक्त राष्ट्र मे स्थायी सीट के लिये अमेरिका की मदद चाहती है।

अमेरिकी प्रशासन के लिये सबसे बड़ा सर दर्द यह है, कि भारत सरकार चीन के विरुद्ध युद्ध करने की मंशा नही रखती है, जिससे अमेरिका को भारत के ऊपर बहुत गुस्सा आता है, क्योकि अमेरिका भारत को इस क्षेत्र का चौधरी बनाकर अपना उल्लू सीधा करना चाहता है।

कई प्रकार के प्रलोभन देने के बावजूद भी भारत सरकार जब चीन से भिड़ने और अफगानिस्तान मे सेना भेजने के लिए तैयार नही हुई, तो अमेरिका ने भारत को सबक सिखाने के लिये सज़ा देना शुरू कर दिया।

उसने भारत को विकासशील देशो वाली सूची अथवा ग्रुप जी-20 से बाहर निकालकर विकसित देशो की सूची मे डाल दिया, जिससे भारत को जी०एस०पी० (Generalised System of Preference) नियम के अंतर्गत मिलने वाली निर्यात संबंधी छूट और सुविधा खत्म हो गई।

यद्यपि विकसित देश होने के लिए कम से कम 12,375 डालर की प्रति व्यक्ति आय होनी चाहिये, किंतु अमरीका के कानून सी०वी०डी० (Counter vailing duty) के अंतर्गत किसी देश की अगर विश्व व्यापार मे भागीदारी 0.5% से अधिक हो, तो उसे भी विकसित देश माना जाता है।

भारत की विश्व व्यापार मे भागीदारी 0.5% से अधिक ( 2018 मे भारतीय निर्यात 1.67% और आयात 2.57% था ) है। बदली परिस्थितियो मे भारत को लगभग 260 मिलियन डॉलर का नुकसान होगा, जिससे निर्यात पर बुरा असर पड़ेगा और लगभग तीन लाख भारतीय अपनी नौकरी गंवा देगे।

ये भी पढ़ें: भारत के साथ कारोबार पर झूठ बोल रहे हैं अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप?

अमेरिका के गुस्से की तीसरी वजह भारत द्वारा रशिया से खरीदे जाने वाले हथियार विशेषकर “एस-400 एंटी मिसाइल सिस्टम” भी है, जिसके खरीदने पर अमेरिका ने तुर्की के ऊपर पाबंदियां लगा दी है, अब वह भारत को भी वैसे ही प्रतिबंधो की चेतावनी देना चाहता है।

हथियार ना बेचने और आर्थिक प्रतिबंध लगाने के अतिरिक्त अमेरिका का एक और बड़ा अस्त्र उसकी मीडिया है, यह अमरीकी मीडिया विशेषकर समाचार-पत्र “वाशिंगटन पोस्ट” कश्मीर और अल्पसंख्यको के ऊपर होने वाले अत्याचारो को लेकर भारत को बदनाम करने मे कोई कमी नही छोड़ रहा है।

पश्चिमी जगत मे “हिटलर” और “फासीवाद” दो अपशब्द माने जाते है, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और उनकी प्रोपेगंडा टीम ने बहुत कुटिलता से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वर्तमान का “हिटलर” और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को “फासीवादी संगठन” बताने का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिशन चालू रखा है, यह दुष्प्रचार इतना घातक है, कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता मोहन भागवत ने अपने कार्यकर्ताओ से “राष्ट्रवाद” (Nationalism) शब्द का उपयोग ना करने का निवेदन किया है।

“आगे खाई और पीछे कुआं” वाली परिस्थिति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिये अमेरिका द्वारा पैदा कर दी गई है,
क्योकि अफगानिस्तान रशिया की तरह एक अशुभ देश है, जिसे विजय करना बहुत मुश्किल होता है अर्थात अपनी सेना वहां भेजना आत्मघाती निर्णय होता है।

तालिबान के नेता मुल्ला उमर का कहना था,कि अफगानिस्तान “ऊंट का तालाब” है अर्थात यहां बड़े से बड़ा शरीर वाला भी सकुशल बचकर नही जा सकता है, ऊपर से हिंदू-कुश पर्वत का इतिहास भारतीय समाज के लिये बहुत पीड़ा दायक है।

अपने समय की सुपर पावर अंग्रेज सरकार अफगानिस्तान मे मुंह की खा कर लौटी थी, सोवियत रूस को ऐसी शर्मनाक हार मिली जिससे उसके 15 टुकड़े हो गये, अब अमेरिका लगभग दो दशक से चली आ रही लड़ाई को हारने के बाद बेहद शर्मिदा होकर अपने सैनिको की जान बख्श ने के लिये तालिबान की ख़ुशामद कर रहा है।

भारत के अफगानिस्तान मे सेना भेजते ही पाकिस्तान की लाटरी खुल जायेगी और वह बड़ी संख्या मे आतंकवादी भेज कर भारतीय हितो को नुकसान पहुंचायेगा, इस प्रकार के छद्म युद्ध (Proxy War) लड़ने मे माहिर पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध एक और मोर्चा खोलने का सौभाग्य प्राप्त होगा।

तालिबान “गज़वा-ए-हिंद” की घोषणा करके (मूर्ति पूजको के विरुद्ध अंतिम युद्ध) भारत की तरफ कूच करेगे, क्योकि उन्हे जिहाद (धर्मयुद्ध) मे भारत के मुसलमानो विशेषकर लगभग दो करोड़ पठानो का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन मिलने की आशा होगी, फिर भारत मे ऐसी अशांति फैलेगी जिसकी कल्पना भी नही की गई है।

मोदी सरकार के अजीत डोभाल जैसे रणनीतिकार तालिबान को छेड़ने का मतलब “पागल कुत्तो को पत्थर मारने” जैसा और खुद को “रिंग मास्टर” मानकर उनसे निबटने मे सक्षम समझते है, किंतु वास्तव मे यह खूंखार “जंगली सूअरो” को छेड़ने के समान आत्मघाती होगा, जो पूरे सर्कस की ईट से ईट बजा देते है।

अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति और मशहूर उज़्बेक नेता (योद्धा) रशीद दोस्तम ने अपने लगभग 65 वर्षीय राजनीतिक प्रतिद्वंदी और जोज़ान (Jowzjan) प्रांत के पूर्व गवर्नर अहमद ईशी (Ahmad Ischi) का अपहरण करके उनसे बला!त्कार करने की कोशिश करी, किन्तु 62 वर्षीय रशीद दोस्तम जब 65 वर्षीय दूसरे पुरुष के साथ बला!त्कार करने मे शारीरिक रूप से असमर्थ रहे, तो उन्होने अपने युवा अंगरक्षको से उस बुजुर्ग (पुरुष) प्रतिद्वंदी के साथ बला!त्कार करवाया।

अफगानिस्तान के आदिवासी दुश्मन की गोली से हत्या करके अपने कारतूस बर्बाद करना नही चाहते है, इसलिये वह सीधे अपने दुश्मन के सिर मे 6 इंच की कील (Fid) गुलमेक ठोक कर उसकी ह!त्या कर देते है।

पहले समय मे अफगानी आदिवासियो के मनोरंजन का सबसे बड़ा खेल “चकरघिन्नी” होता था, इसके क्रीड़ा के अंतर्गत वह अपने शत्रु की गर्दन काट कर उसकी गर्दन के स्थान पर आग मे तपता हुआ तवा रख देते थे, जिससे मृत शरीर खड़े-खड़े आतिशबाजी (चक्री) की तरह कुछ समय तक घूमता था।

भारत को श्रीलंका मे शांति सेना भेजने का बेहद कड़वा अनुभव रहा है,ऐसे मे खूंखार आतं!कवादियो के बीच अफगानिस्तान मे भारतीय सेना को भेजना न्यायोचित और तर्कपूर्ण निर्णय नही होगा, इसलिए भारत सरकार को सतर्क रहते हुये अमरीकी षड्यंत्र से बचना होगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति दबाव बढ़ाने मे माहिर (दक्ष) माने जाते है, नरेंद्र मोदी एक भावुक राष्ट्रवादी और देशभक्त व्यक्ति है, वह भावनाओ मे बहकर अफगानिस्तान मे सेना भेजने का अविवेकपूर्ण निर्णय ले सकते है। किन्तु अगर ऐसा हुआ, तो इस निर्णय को “विनाश काले विपरीत बुद्धि” ही कहा जायेगा।

{ये लेखक के अपने विचार हैं }

एज़ाज़ क़मर (रक्षा, विदेश और राजनीतिक विश्लेषक)

 

Tags: AfghanistanAMERICAIndia
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