राम-कथा मिथक है, इतिहास नहीं. लेकिन कोई भी मिथक शून्य में नहीं बनता. कुछ यथार्थ में घटित होता है और जनश्रुति में तैरता रहता है, जो साहित्यकार की कल्पना के रेशमी तारों से बुने संजाल में लिपटकर अलौकिक और उदात्त बन जाता है. ऐसा कि सदियाँ बीतती हैं, सहस्राब्दियाँ बीतती हैं और वह निरंतर अद्यतन बना रहता है.
हम नहीं जानते कितना और क्या घटित हुआ, कितना और क्या कल्पना है. लेकिन राम और उनसे जुड़े अनेक चरित्र हमारे बीच जीवित हैं, और रहेंगे…कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी….
कई-कई रामायणें हैं, राम के कई-कई
रूप हैं. इस समय सबसे लोकप्रिय तुलसी का रामायण है, जिसे तुलसी ने रामचरितमानस की भी संज्ञा दी थी. रामचरितमानस पढ़ते हुए लगता है, राम अतीत नहीं हैं, वे तुलसी के भक्त मानस में सतत मौजूद हैं.
एक रामायण और है–अवध की निरक्षर, गाँव-घर की चारदीवारी में क़ैद, घर-गृहस्थी के काम में मशगूल, सर्व-साधारण महिलाओं का रामायण, जो उनके गीतों में साँस लेता है. पढ़े-लिखे, संभ्रांत शहरी कम ही जानते हैं इस रामायण को. रहे होंगे दशरथ और कौशल्या अयोध्या के राजा-रानी. इन गँवई स्त्रियों का यह रामायण तो उन्हें राजमहल से उठाकर किसान के घर में बिठा देता है. राम उसी की कोठरी में पैदा होते हैं, उसी के आँगन की धूल में खेलकर बड़े होते हैं. एक दिन आता है जब मचिया पर बैठकर कौशल्या ‘रानी’ दशरथ से बाँस और सरपत का ‘माँडव’ छवाने की अरज करती हैं, जिसके नीचे ‘बरुआ’(बटुक) बने राम का जनेऊ होता है. फिर राम केसरिया पाग पहनकर, भाइयों के साथ बारात लेकर सीता को ब्याहने जनकपुर जाते हैं और धूप से कुम्हलाई सीता को साथ लेकर लौटते हैं.आटे की दियली से, जलभरे कलश (लोटे) से, मूसल से, लोढ़े से, सूप से, और फिर किसी बुज़ुर्ग सुहागन के आँचल से, परस्पर गाँठ-बाँधे हुए राम और सीता की परछन ( प्रदक्षिणा) होती है, और थोड़े ही दिनों में सीता घर-गृहस्थी के काम में जुट जाती हैं. फिर एक दिन वही सीता राम और लक्ष्मण के साथ कुश-काश से भरे, अँधेरे, विकट जंगलों की ओर चल देती हैं. अवध का हर दूल्हा राम है, उसके पिता दशरथ, माँ कौशल्या और नई बहू सीता.और जीवन में कम-ज़्यादा सीता का दु:ख झेलना ही उसकी नियति है.
इन ग्राम्य गृहिणियों की सीता का भी निर्वासन होता है, लेकिन उस वजह से नहीं जिस वजह से वाल्मीकि की सीता का. ये वाल्मीकि को नहीं जानतीं, न उनका रामायण जानती हैं. लेकिन सीता के निर्वासन की बात इन्होंने कहीं से सुन ज़रूर रखी है. इनकी सीता इनके जैसी ही हैं, तो वे ननद के साथ पानी भरने जाती हैं, कोठरी लीपती हैं, घर की टहल करती हैं. और ननद की चुगली का शिकार भी होती हैं. उनका निर्वासन भी उन्हीं कारणों से होता है, जिनसे इन निरक्षर, असहाय गृहणियों का होता है; वही इनकी समझ में आता है. और वह कारण शायद ज़्यादा मानवीय, ज़्यादा विश्वसनीय भी है:
ननद भौजाई दूनौं पानी भरै गईं, अरे पानी भरै गईं.
भौजी जौन रवनवाँ तुहैं हरि लइगा ओका उरेहि देखावहु.
जौ मैं रवना उरेहौं, उरेहि देखावउँ.
सुनि पैहैं बिरन तुम्हार त देसवा निकरिहैं.
[ननद-भौजाई (सीता और राम की बहन शान्ता–उत्तररामचरितम् में यह नाम आता है) कुएँ पर पानी भरने गईं. “अरे भौजी, जो रावण तुम्हें हर ले गया था, वह था कैसा? उसका चित्र उकेरकर मुझे भी तो दिखाओ (‘उरेहने’ से ही ‘उकेरना’ बना होगा).” “मैं उसका चित्र उकेरूँ, उकेरकर तुम्हें दिखाऊँ, और उधर तुम्हारे भाई सुन लें, तो मुझे तो देश से ही निकाल देंगे.”]
लाख दोहइया राजा दसरथ, राम मथवा छुऔं.
भौजी लाख दोहइया लछिमन भइया, जो भइया से बतावउँ.
माँगौं न गाँग गँगुलिया गंगाजल पानी.
ननदी समुहे क ओबरी लिपावउ मैं रवना उरेहौं.
[“मैं राजा दशरथ की लाख कसम खाती हूँ, राम का माथा छूकर कसम खाती हूँ, लक्ष्मण भैया की लाख कसम खाती हूँ, मैं भाई राम से नहीं बताऊँगी.” “तो ठीक है ननदरानी, गगरी में गंगाजल लाओ, सामनेवाली कोठरी लीप दो. मैं रावण का चित्र उकेर दूँगी.]
माँगिन गाँग गँगुलिया गंगा जल पानी.
सीता समुहें क ओबरी लिपाइन रवना उरेहैं.
हँथवहु सिरजिन गोड़वहु, नयना बनाइन.
आइ गये हैं सिरीराम अँचर छोरि मूँदेनि.
[गंगाजल आया. सीता को ही सामने की कोठरी भी लीपनी पड़ी. और वे रावण को उकेरने बैठीं. पहले हाथ बनाया, फिर पैर. फिर आँखें बनाईं. तब तक अचानक श्रीराम आ गये. जल्दी से सीता ने अपना आँचल खोलकर चित्र को ढक दिया.]
जेवन बैठे सिरीराम बहिन लोइ लाइन.
भइया जौन रवन तोर वैरी त भौजी उरेहैं.
अरे रे लछिमन भैया बिपतिया कै साथी.
सीता क देसवा निकारहु रवना उरेहै.
[श्रीराम भोजन करने बैठे और बहन ने लूकी लगा दी—“भैया, रावण, जो तुम्हारा दुश्मन है, भौजी उसका चित्र उकेर रही हैं.” राम ने तुरंत लक्ष्मण से कहा—विपत्ति के साथी भाई लक्ष्मण, सीता को देश से निकालो, वह रावण का चित्र उकेरती है.]
जे भौजी भूखे क भोजन, नाँगे क बस्तर.
जे भौजी गरुहे गरभ से मैं कैसे निकारहुँ.
[‘’जो भौजी भूखे को भोजन और नंगे को वस्त्र देती हैं, और जो गर्भ के भार से दबी हैं उन्हें कैसे निकालूँ ?’’]
एक बन गइलीँ, दुसर बन गइलीं, तिसरे बिंद्रावन.
देवरा एक बुँद पनिया पिअउतेउ पिअसिया से व्याकुल.
बैठहु न भौजी चंदन तरे चँदना बिरिछ तरे.
भौजी पनिया क खोज करि आई त तोहका पिआई.
[(राम नहीं ही माने तो) लक्ष्मण सीता को साथ लेकर इस बहाने से निकल पड़े कि तपोवन से न्योता आया है. एक वन पार किया, दूसरा वन पार किया, तब वृंदावन आया (अवध के लोकगीतों में लम्बी यात्रा का वर्णन हमेशा ऐसे ही होता है).“देवर एक बूँद पानी पिलाओ, प्यास से व्याकुल हूँ.” “भौजी, इस चंदन के वृक्ष के नीचे बैठ जाओ, पानी खोजकर लाऊँ, तो तुम्हें पिलाता हूँ.”]
बहै लागी जुडुली बयरिया कदम जूड़ि छहियाँ.
सीता भुइयाँ परी कुम्हिलाय पिअसिया से व्याकुल.
तोरिन पतवा कदम कर दोनवा बनाइन.
टाँगिन लवँगिया के डरिया लछन चलें घर के.
[ठंडी बयार बहने लगी. कदम्ब की ठंडी शीतल छाया. प्यास से व्याकुल, कुम्हलाई सीता को ज़मीन पर पड़े-पड़े नींद आ गई. (लक्ष्मण पानी लेकर लौटे और सीता को सोती देखा तो उन्हें मौका मिल गया.) लक्ष्मण ने कदम्ब का पत्ता तोड़ा, उसका दोना बनाया. उसमें पानी भरकर उसे लवंग की डाल से लटका दिया और (सीता को वहीं सोती छोड़कर) घर चल दिए.]
सोये-सोये सीता जागीं झमकि उठि बैठीं.
कहवाँ गये लछिमन देवरा त हमैं न बताएउ.
हिरदय भरि देखतिउँ नजर भरि रोउतेउँ.
[सीता सोते-सोते जगीं और हड़बड़ाकर उठ बैठीं. (दोने में लटका हुआ पानी देखकर किंतु लक्ष्मण को न पाकर विलाप करने लगीं–) हमें बिना बताये लक्ष्मण देवर कहाँ चले गये ! (बता देते कि वन में छोड़कर जा रहे हैं, तो) एक बार जी भरकर देख तो लेती, आँख भरकर रो तो लेती.]
को मोरे आगे-पीछे बैठइ को लट छोरै.
को मोरी जगइ रइनिया त नरवा छिनावइ.
बन से निकरीं बन-तपसिन सितइ समुझावैं.
सीता हम तोरे आगे-पीछे बैठब हम लट छोरब.
हम तोरी जगबै रइनिया त नरवा छिनउबै.
[“हाय ! (इस गर्भ की हालत में) इस वन में कौन मेरे आगे-पीछे बैठेगा, कौन मेरे बालों की लट खोलेगा, कौन मेरी रात जागेगा, और कौन काटेगा मेरे बच्चे का नाल ?”. सीता का विलाप सुनकर वन की तपस्विनियाँ निकलकर आईं– “ हे सीता, हम तुम्हारे आगे-पीछे बैठेंगी, हम तुम्हारी लट खोलेंगी, हम तुम्हारी रात जागेंगी. और हम बच्चे का नाल भी काटेंगी. ]
होत बिहान लोही लागत होरिल जनम भए.
सीता लकड़ी क करउ अँजोर संतति मुख देखहु.
तुम पुत भयउ बिपति में बहुतै सँसति में.
पुत कुसै ओढ़न कुस डासन बन-फल भोजन.
जो पुत होत्या अजुधिया में वहि पुर पाटन.
राजा दसरथ पटना लुटौतें कैसिल्या रानी अभरन.
[सबेरा होते ही, जब पौ फट ही रही थी, बच्चे का जन्म हुआ. तपस्विनियों ने कहा—सीता, थोड़ी लकड़ी जलाओ, उसके उजाले में अपने बच्चे का मुँह देख लो. सीता बच्चे को देखकर कहने लगीं—बेटा, तुम घोर विपत्ति, बड़ी साँसत में पैदा हुए हो. कुश ही तुम्हारा ओढ़ना, कुश ही बिछौना है, और जंगली फल ही तुम्हारा भोजन है. बेटा, यदि तुम अयोध्या शहर में पैदा हुए होते, तो आज राजा दशरथ सारा शहर लुटा देते (लोक कवियित्री को दशरथ की मृत्यु का या तो पता नहीं या ख्याल नहीं आया) और रानी कौशल्या अपने सारे गहने लुटा देतीं.】
कमलाकांत त्रिपाठी













